कभी शूटिंग के बारे में नहीं जानती थीं मनीषा, अब एशियन गेम्स में देश के लिए पदक जीतने का है सपना

Posted on: 2026-09-01


नई दिल्ली, 01 सितंबर । भारतीय ट्रैप शूटर मनीषा कीर के लिए शूटिंग कभी उनके जीवन की योजना का हिस्सा नहीं थी। भोपाल के पास एक गांव के साधारण परिवार में पली-बढ़ी मनीषा को एक समय तक यह भी पता नहीं था कि शूटिंग नाम का कोई खेल होता है। उनकी बड़ी बहन सोना ने उन्हें इस खेल से परिचित कराया और यहीं से शुरू हुआ सफर उन्हें राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गया।

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए मनीषा ने नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) के हवाले से कहा, “मुझे तो पता ही नहीं था कि शूटिंग क्या होती है। मैं सिर्फ क्रिकेट, वॉलीबॉल और फुटबॉल जानती थी। मुझे शूटिंग के बारे में कुछ पता नहीं था और मैंने इसके बारे में कभी सोचा भी नहीं था।”

मनीषा की बड़ी बहन सोना खुद भी खिलाड़ी थीं और उन्होंने ही मनीषा को शूटिंग की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, खेल से जुड़ना उनके लिए आसान नहीं था। सीमित आर्थिक संसाधनों वाले परिवार से आने के कारण उन्हें अपने खेल के लिए कई तरह के समझौते करने पड़े।

उन्होंने कहा, “मेरा परिवार मुझे उस तरह से सहयोग करने में सक्षम नहीं था। वे मुझे वह सब कुछ नहीं दे सकते थे जो मैं चाहती थी। मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था।”

शूटिंग महंगा खेल है और प्रतियोगिताओं के लिए यात्रा के दौरान मनीषा को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। महज 18 साल की उम्र में उन्हें अपने खर्चों को लेकर कई बार मुश्किल फैसले लेने पड़ते थे।

मनीषा ने बताया, “जब मैं प्रतियोगिताओं के लिए बाहर जाती थी तो मुझे काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। मैं अपनी पसंद का खाना नहीं खा पाती थी और मुझे कुछ पैसे बचाने पड़ते थे।”

मध्य प्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी में शुरुआती दिनों में भी परिस्थितियां आसान नहीं थीं। नियमित कोच उपलब्ध नहीं होने के बावजूद मनीषा ने उपलब्ध संसाधनों में ही सीखना जारी रखा। उनकी बहन ने भी इस दौरान उनका मार्गदर्शन किया।

उन्होंने कहा, “अकादमी में जो भी सुविधाएं थीं, वे हमारे लिए पर्याप्त थीं। मेरा मानना है कि आपके पास जो है, आपको उसी के साथ आगे बढ़ना होता है।”

यही सोच आगे चलकर मनीषा की पहचान बनी। उन्होंने सुविधाओं की कमी पर ध्यान देने के बजाय उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल किया और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

मनीषा ने 2018 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में ट्रैप स्पर्धा का रजत पदक जीता। इसके अलावा उन्होंने एशियन गेम्स में भारतीय महिला ट्रैप टीम के साथ रजत पदक भी हासिल किया।

हालांकि, मनीषा के लिए उनकी यात्रा केवल पदकों तक सीमित नहीं रही। शुरुआती संघर्षों ने उन्हें आत्मनिर्भरता और मानसिक मजबूती भी सिखाई।

उन्होंने कहा, “कोई भी हमेशा हमारे साथ नहीं रह सकता। हमें खुद का भी ध्यान रखना होता है। यह भी मेरे लिए एक बड़ी सीख रही।”

मनीषा की यात्रा एक ऐसी लड़की से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने की कहानी है, जिसे कभी शूटिंग के बारे में जानकारी तक नहीं थी। उन्होंने कहा, “मेरे पास जो कुछ भी था, मैंने उसी से सीखा और इसी तरह आगे बढ़ती गई।”

समय के साथ उनके साथ सहयोग करने वाला तंत्र भी मजबूत हुआ। नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के अवसर उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मनीषा ने कहा, “एनआरएआई का सहयोग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जब आप ऐसे परिवार से आते हैं जहां आपके पास सब कुछ नहीं होता, तब कोई संस्था आपको प्रतिस्पर्धा करने, प्रशिक्षण लेने और देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर देती है तो यह बहुत मायने रखता है। मैं इस सहयोग और मिले अवसरों के लिए बहुत आभारी हूं।”

अब एशियन गेम्स की चुनौती सामने है और मनीषा अपने अनुभव, संघर्ष और आत्मविश्वास के साथ एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करने के इरादे से तैयार हैं।