नई दिल्ली, 13 अगस्त। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुरुवार को वर्ष 2024 और 2025 के लिए 100 से अधिक प्रख्यात कलाकारों को संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि कलाकार भारतीय परंपरा के वाहक होने के साथ हमारी सामूहिक स्मृति के संरक्षक और भविष्य की दृष्टि के सृजनकर्ता हैं।
इस अवसर पर रामलाल बरेठ, ए.वी. आनंद, रीता गांगुली, पुरु दधेीच, चित्तरंजन ज्योतिषी, पसुमार्थी रत्तैया शर्मा और सुधरानी रघुपति सहित सात कलाकारों को संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से अलंकृत किया गया।
वर्ष 2024 के लिए संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक एवं जनजातीय कला सहित विभिन्न क्षेत्रों के 54 कलाकारों को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनमें बांसुरी वादक राकेश चौरसिया, अभिनेता अरुण नालवड़े और लोक नृत्यांगना गुलाबी सपेरा सहित अन्य कलाकार शामिल हैं।
वर्ष 2025 के लिए भी विभिन्न कला विधाओं से जुड़े 54 कलाकारों को अकादमी पुरस्कार प्रदान किए गए। इनमें भरतनाट्यम की कलाकार रोजा कन्नन, कथक से जुड़े कृष्ण मोहन मिश्रा महाराज, रंगमंच निर्देशक कपिलदेव चंद्रकांत शुक्ला और लोक संगीत कलाकार भेरू सिंह चौहान सहित अन्य कलाकार शामिल हैं।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि आज सम्मानित किए गए कलाकार सामूहिक रूप से देश का सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं। यह मानचित्र देश की मिट्टी से जुड़ी कहानियों और गीतों, विविध नृत्य एवं त्योहारों तथा सदियों से विकसित भाषाओं और बोलियों की स्मृतियों से बुना हुआ है।
उन्होंने कहा कि देश में संगीत की अनेक परंपराएं, विभिन्न नृत्य शैलियां और लोक रंगमंच की अनगिनत विधाएं मौजूद हैं। भारतीय संस्कृति की जड़ें प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं। देश की विविध खानपान परंपराओं, पहनावे, नृत्य और संगीत में प्रकृति की प्रेरणा दिखाई देती है। कलाकार पक्षियों के कलरव, झरनों की ध्वनि, पेड़-पौधों, बादलों और नदियों से प्रेरणा लेकर अपनी कला को अभिव्यक्ति देते हैं। विविधता और एकता का यह संबंध भारतीय कलाओं की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है।
राष्ट्रपति ने कहा कि देश की विविध कला विधाओं के संरक्षण और विकास में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि कला के क्षेत्र में गुरु सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक के समान होते हैं। तेजी से बदलते समय में अनेक लोक कला विधाएं विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। इसलिए इन कलाओं का दस्तावेजीकरण करने के साथ-साथ उन्हें जीवित रखने के लिए विशेष प्रयास किए जाने जरूरी हैं।
उन्होंने संगीत नाटक अकादमी की ओर से इसी उद्देश्य से आयोजित किए जा रहे ‘कला-दीक्षा’ कार्यक्रम की सराहना की और वरिष्ठ कलाकारों से अगली पीढ़ी को तैयार करने के लिए व्यवस्थित प्रयास करने का आह्वान किया।
राष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति कला के मूल्यों और संवेदनाओं के माध्यम से जीवन को समृद्ध बनाने का सबसे स्वाभाविक प्रशिक्षण स्थल है। लोक और जनजातीय कलाएं जीवन के प्रति स्वाभाविक उत्साह तथा प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं। इन कलाओं में समुदाय की स्मृति और सामूहिक चेतना सहज रूप से अभिव्यक्त होती है। इसी कारण लोक कलाएं भारत की सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।
राष्ट्रपति ने संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी कलाकारों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा के वाहक के रूप में ये कलाकार हमारी सामूहिक स्मृति के संरक्षक होने के साथ भविष्य की दृष्टि के निर्माता भी हैं।
उन्होंने कहा कि संगीत नाटक अकादमी को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में माना जाता है। राष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि अकादमी आने वाले समय में भी भारत की सांस्कृतिक ऊर्जा से पूरी दुनिया को समृद्ध करती रहेगी।