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अम्बिकापुर, 03 जुलाई। छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट में बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर माहौल पूरी तरह गरमा गया है। सरगुजा जिले के मैनपाट ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत रोखापार और कमलेश्वरपुर क्षेत्र के चार गांवों रोपाखार, सरभंजा, लुरैना और पथरई में नई प्रस्तावित खदानों को लेकर ग्रामीणों का भारी आक्रोश फूट पड़ा है।
सरभंजा में शुक्रवार काे आयोजित जनसुनवाई के दौरान प्रभावित ग्रामीणों ने न केवल प्रक्रिया का पूर्ण बहिष्कार किया, बल्कि भारी बारिश के बीच छाता तानकर 'सीएमडीसी भागो' के जमकर नारे लगाए। इस विरोध प्रदर्शन के बाद क्षेत्र में बड़ा जनआंदोलन और सियासी टकराव खड़ा हो गया है। सीतापुर के वर्तमान भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो ने भी जनसुनवाई में पहुंचकर ग्रामीणों का पक्ष लिया और साफ किया कि किसी भी विकास कार्य के लिए स्थानीय जनता की सहमति सर्वोपरि है। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इस परियोजना की स्वीकृति साल 2022 में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार के समय दी गई थी, लेकिन जनभावनाओं के खिलाफ जाकर किसी भी कीमत पर यहां माइनिंग शुरू नहीं होने दी जाएगी। दूसरी ओर, पूर्व मंत्री व पूर्व विधायक अमरजीत भगत भी इस नई खदान परियोजना के विरोध में लगातार मोर्चा खोले हुए हैं।
इस परियोजना के विरोध में स्थानीय जनप्रतिनिधि और ग्रामीण एकजुट हैं। ग्राम पंचायत रोखापार के उप सरपंच रजनीश पाण्डेय ने आरोप लगाया है कि यह पूरा माइनिंग प्लान बड़े पैमाने पर किए गए फर्जीवाड़े पर आधारित है। कुल 55 हेक्टेयर भूमि पर होने वाले इस खनन को लेकर न तो ग्राम पंचायत को कोई दस्तावेज दिए गए और न ही ग्राम सभा से कोई प्रस्ताव पारित कराया गया है। उप सरपंच के अनुसार, कंपनियों ने अपने माइनिंग प्लान में मैनपाट के सबसे प्रमुख पर्यटन स्थलों, जैसे बौद्ध विहार, बौद्ध मंदिर, हिलती जमीन के लिए प्रसिद्ध 'जलजली' और बायो डायवर्सिटी पार्क के अस्तित्व को पूरी तरह से छिपा दिया है। यही नहीं, खदान के पास स्थित रिजर्व फॉरेस्ट (आरक्षित वन) को भी सरकारी कागजों में 10 किलोमीटर दूर दर्शाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र तिब्बती शरणार्थियों का पुनर्वास क्षेत्र और घनी बसाहट वाला इलाका है, जहां हजारों लोगों का रोजगार पूरी तरह से पर्यटन पर निर्भर है। कंपनियों द्वारा महज 40-50 लोगों को रोजगार देने का दावा पूरी तरह नाकाफी और भ्रामक है।
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि वे पर्यटन को प्रभावित करने वाली किसी भी नवीन खदान को खुलने नहीं देंगे। उनका कहना है कि मैनपाट को 'छत्तीसगढ़ का शिमला' कहा जाता है, और यदि यहां बेतरतीब तरीके से बॉक्साइट का खनन शुरू हुआ, तो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता, जलस्तर और पर्यावरण पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे। माइनिंग से होने वाले भारी प्रदूषण, जंगलों की कटाई और हैवी ब्लास्टिंग के कारण पर्यटन उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएगा, जिससे हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। ग्रामीणों की मांग है कि जहां पहले से खदानें संचालित हैं, वहां बेहतर माइनिंग प्लान के साथ काम किया जाए, लेकिन नए क्षेत्रों में प्रकृति और स्थानीय लोगों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।