दिल्ली 16 जून: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि RTI एक्टिविज़्म एक नया धंधा बन गया है। कोर्ट ने सड़क निर्माण के काम में सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने के आरोपी एक एक्टिविस्ट और दूसरे व्यक्ति को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने RTI एक्टिविस्ट राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी को ज़मानत देने से मना कर दिया और सड़क निर्माण के काम की निगरानी करने के उनके अधिकार पर सवाल उठाए।
जस्टिस मेहता ने कहा, "RTI एक्टिविज़्म एक नया धंधा बन गया है। केंद्र सरकार ने फंड जारी किया है, वह सड़क निर्माण का ध्यान रखेगी। आप कोई नहीं हैं। तथाकथित RTI एक्टिविस्ट! पीत पत्रकारिता (येलो जर्नलिज़्म)। याचिका खारिज।" जस्टिस मेहता की बात से सहमत होते हुए जस्टिस बिश्नोई ने कहा, "इन सभी सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले आप कौन हैं? क्या आप कोई उच्च अधिकारी हैं या क्या?" बहल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें उन्हें अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया था। उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है क्योंकि उन्होंने सड़क निर्माण के काम में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया था। FIR के अनुसार, बहल ने एक अन्य आरोपी राजीव कुमार उर्फ मिंटू के साथ मिलकर पंजाब के गुरदासपुर ज़िले के बटाला में चल रहे सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली और शिकायतकर्ता (जिसकी देखरेख में काम हो रहा था) और साइट पर मौजूद मज़दूरों को धमकाया।
उन्होंने मज़दूर के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और शिकायतकर्ता को चोट भी पहुंचाई। उनके खिलाफ BNS, 2023 की धाराओं 304(2), 132, 221, 121(1), 351(2), 351(3) (BNS, 2023 की धाराएं 3(5), 121(2) और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)) के तहत FIR दर्ज की गई थी। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 14 मई के अपने आदेश में कहा कि FIR में लगाए गए आरोप सरकारी काम में बाधा डालने में उनकी विशिष्ट और सीधी संलिप्तता को दर्शाते हैं और उन्हें अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया।